हरीश रावत क्यों बोले, वाह, आई एम तांत्रिक….. !! हरीश रावत के इस पोस्ट से सियासी गलियारों में हलचल तेज, पढ़ें पूरी पोस्ट…

Spread the love

हरीश रावत अपने बयानों से सियासी गलियारों में हलचल मच जाती है एक बार फिर उन्होंने ऐसा ही किया है। हरदा ने पोस्ट कर लिखा है कि वाह, आई एम तांत्रिक….

वाह, एम.आई. तांत्रिक….. !!हां, मैं गलतफहमियों का शिकार हूं, “मैं ही कांग्रेस हूं” की धारणा लेकर मैंने निम्न कदम उठाए। कांग्रेस राज्य आंदोलन के चरम के कालखंड में पूर्णतः हाशिए पर न चली जाए, इस हेतु अपने थोड़े-बहुत पार्टी और सरकार पर प्रभाव का उपयोग कर अपने दोस्तों की मदद से कभी अधिकार प्राप्त निर्वाचित हिल काउंसिल, तो कभी 27% आरक्षण की परिधि के साथ केंद्र शासित राज्य के लिए विभिन्न स्तरों पर केंद्र सरकार के मंत्रियों के साथ वार्ताएं आयोजित करवाईं। एक के बाद एक हजारों लोगों को, जिनमें आंदोलनरत कर्मचारी भी थे, उन्हें इन वार्ताओं का हिस्सा बनाकर पार्टी को संगत बनाए रखा। कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश की सरकार को समर्थन दे रही थी। हमारे विधायक उनके समर्थन में हाथ खड़ा करते थे और उत्तराखंड में एक के बाद एक अत्याचार की घटनाएं हो रही थीं। इसी कालखंड में खटीमा, मसूरी, देहरादून, मुजफ्फरनगर में पुलिस की गोलियों से लोग मरे और महिलाओं पर अत्याचार हुआ।भाजपा, यूकेडी और दूसरे राज्य आंदोलन के संगठन नरसिम्हा राव-उत्तराखंड का काव जैसे नारे लगाकर कांग्रेस को राज्य के राजनीतिक जीवन से बाहर धकेलने का प्रयास कर रहे थे। मैंने हजारों आलोचनाएं सहकर भी वार्ताएं आयोजित करवाईं। अपना मत लोगों के सम्मुख रखा। कांग्रेसजनों को वार्ताओं में आमंत्रित कर उनको राज्य के सामाजिक जीवन में सम्यक बनाए रखा।प्रधानमंत्री जी के आवास में भी तीन बार बैठकें आयोजित कर उत्तराखंड का नारा गूंजायमान करवाया। एक तांत्रिक ही शायद यह कर सकता है। हजारों कर्मचारियों के सामने “नो वर्क, नो पे, ब्लैक इन सर्विस” की स्थिति खड़ी हुई, तब भी मदद के लिए यह तांत्रिक ही आगे आया। जब 2 अक्टूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान हुई तोड़फोड़ आदि को लेकर हजारों लोगों पर मुकदमे दर्ज हुए, तब भी “मैं ही कांग्रेस हूं” की गलतफहमी का शिकार “हरीश रावत” ही आगे आया।जब राज्य आंदोलन निराशा की गर्त में चला जा रहा था, उस समय राज्य आंदोलनकारियों ने मुझे संयुक्त संघर्ष समिति का संयोजक चुना।

श्री दिवाकर भट्ट जी को अध्यक्ष चुना और श्री पूरन सिंह डंगवाल से लेकर धीरेंद्र प्रताप, हरिपाल रावत, राजेंद्र शाह आदि सभी लोग उस संयुक्त संघर्ष समिति का हिस्सा बने और हमने आंदोलन को फिर से गति दी, फिर से दिल्ली के अंदर विशाल रैली का आयोजन कर आंदोलन को संगत बनाया। दिल्ली और एनसीआर का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा, जहां के थानों में हमने राज्य के लिए आवाज बुलंद कर वहां के लॉकअप में बंद होने का सौभाग्य हासिल न किया हो। प्रधानमंत्री जी के आवास तक में एक बार आंदोलनकारी घुस गए। हमने यह निरंतर प्रयास जारी रखा कि केंद्र सरकार जिस पार्टी की थी, उस पार्टी के ऊपर यह राजनीतिक दबाव बना रहे कि राज्य आंदोलन जिंदा है। यह सोच और समझ भी एक तांत्रिक की ही हो सकती है।

कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के महा अधिवेशन में एक राजनीतिक प्रस्ताव के दौरान मैं और मेरे साथी यह जुड़वाने में सफल रहे कि कांग्रेस छोटे राज्यों के पक्ष में है, नए राज्यों के निर्माण के लिए आम सहमति बनाने में कांग्रेस के इस प्रस्ताव ने महान भूमिका अदा की।झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, यहां तक कि तेलंगाना के निर्माण के लिए भी सर्वसम्मति बनाने में कोलकाता अधिवेशन के इस प्रस्ताव की महान भूमिका रही है। शायद मुझे इसलिए यह गलतफहमी हो गई हो कि “मैं ही कांग्रेस हूं”।

मैंने राज्य आंदोलन के साथ संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक के रूप में राज्य आंदोलनकारियों और यूकेडी के एक बड़े हिस्से को कांग्रेस पार्टी के साथ जोड़ा, कांग्रेस को नई ऊर्जा मिली। यहीं से वर्ष 2002 में कांग्रेस के सत्ता में आने की भूमिका बनी। एक तंत्र शास्त्री ही ऐसा कर सकता है। इसलिए मैंने मान लिया है कि मैं तांत्रिक हूं, मगर मैं ही कांग्रेस हूं—इस गलतफहमी का मैं कभी भी शिकार नहीं रहा।अच्छा पहचाना है, अच्छी उपाधि दी है। धन्यवाद


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *